उत्तराखंड राज्य के प्रतीक चिन्ह क्या है -राज्य पक्षी,राज्य पुष्प ,राज्य चिन्ह कहाँ से लिया है ?

उत्तराखंड– उत्तरप्रदेश के हिमालयी भाग को अलग करके बना हुआ राज्य है.यहां की ऊंची ऊंची पहाड़ियां खेत खलिहान आदि उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को अलग बनाती हैं.आज हम आपको अपने उत्तराखंड राज्य के प्रतीक चिन्ह और उनके बारे में कुछ जानकारियां आपको देने का प्रयास करेंगे.

उत्तराखंड का राजकीय चिन्ह

उत्तराखंड के राज्य चिन्ह में हमारे भौगोलिक स्वरूप के दर्शन होते हैं.जैसा उत्तराखंड दिखने में है वैसा ही उसका राज्य चिन्ह भी बनाया गया है.इस चिन्ह में सबसे ऊपर तीन पर्वत पर्वत चोटियां और सबसे नीचे गंगा की चार लहरें दर्शाई गई हैं और इसके मध्य में अशोक का ललाट स्थित है.इसके नीचे ही सत्यमेव जयते लिखा गया है.जिसे मुण्डकोपनिषद से लिया गया है

उत्तराखंड का राज्यकीय पुष्प

ब्रह्मकमल– ब्रह्मकमल उत्तराखंड राज्य का राज्य पुष्प है.यह मध्य हिमालय ने 4800 से 6000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाने वाला ऐसटेरसी कुल का पौधा है.जिसका वैज्ञानिक नाम सोसूरिया अबवेलेटा है.वैसे तो पूरे विश्व में ब्रह्मकमल की कुल 210 प्रजातियां पाई जाती हैं लेकिन उत्तराखंड में इनकी संख्या 24 है.

उत्तराखंड में ब्रह्मकमल की पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियां – सोसूरिया ग्रार्मिनिफोलिया (फेन कमल ), सोसूरिया लप्पा, सोसूरिया सिमेसोनिया,सोसूरिया ग्रासोफिरेरा.ब्रह्मकमल उत्तराखंड में फूलों की घाटी,केदारनाथ शिवलिंग क्षेत्र,पिंडारी ग्लेशियर आदि स्थानों पर बहुतायत मात्रा में होता है.ब्रह्मकमल का जिक्र वेदों में भी देखने को मिलता है.महाभारत में इसे सौगंधिक पुष्प का नाम दिया गया है.स्थानीय भाषा में इसे कौल पद्म भी कहा जाता है.ब्रह्मकमल के पौधे की ऊंचाई करीब 70 से 80 सेंटीमीटर तक होती है.

उत्तराखंड का राजकीय वृक्ष 

बुरांँश- उत्तराखंड राज्य का राज्य वृक्ष बुरांँश एक पर्वतीय सदाबहार वृक्ष है जो कि मैदानी भागों में नहीं पाया जाता है.बसंत के मौसम में इसमें लगने वाले फूल इस वृक्ष को और ज्यादा मनमोहक बना देते हैं.बुरांँश का वैज्ञानिक नाम रोडोडेन्ड्रान अरबोरियम है.1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर बुरांश के फूलों का रंग चटखा लाल होता है.ऊपर बढ़ने पर इसके फूलों का रंग गहरा लाल व हल्का लाल हो जाता है और ऊपर बढ़ने पर इसमें सफेद रंग के फूल खिलते हैं.जो कि मकर संक्रान्ति के समय धीरे धीरे खिलने शुरू होते हैं और बैसाखी तक पूरे खिल जाते हैं.

बुरांश का उपयोग – बुणों से भरपूर होते हैं.इनका प्रयोग दवाईयों में भी किया जाता है.इनसे बना जूस हृदय रोगियों के लिए काफी लाभदायक होता है.इसकी तासीर ठंडी मानी जाती है.इसके अलावा इसके फूल रंग बनाने में भी प्रयोग किए जाते हैं.बुरांश की लकड़ी मुलायम होती है इसलिए इसका  ज्यादातर ईधन के रूप में प्रयोग होता है.इसके पत्ते मोटे होते हैं जिन्हें खाद बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है.साथ ही पर्वतीय स्रोतों को बनाए रखने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है.अवैध कटान अधिक होने के कारण 1974 से इस वृक्ष को संरक्षित वृक्ष घोषित कर दिया गया है.

उत्तराखंड का राजकीय पशु

कस्तूरी मृग-कस्तूरी मृग को  हिमालयन मस्क डियर भी कहा जाता है.इसका वैज्ञानिक नाम मास्कस काईसोगांँस्टर  है.कस्तूरी मृग का रंग भूरा होता है तथा उस पर काले धब्बे होते हैं.इसकी ऊंचाई करीब 20 इंच और वजन 10 से 20 किलोग्राम होता है.यह 3600 से 4400 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है.इसके सींग नहीं होते हैं अपितु अपने बड़े बड़े दातों से यह अपनी रक्षा करते हैं.कस्तूरी मृग उत्तराखंड के अलावा कश्मीर हिमांचल प्रदेश ,सिक्किम में भी पाए जाते हैं.

कस्तूरी मृग में पाए जाने वाली कस्तूरी-कस्तूरी मृग का सबसे ज्यादा प्रसिद्ध होने का कारण है इसमें पाई जाने वाली कस्तूरी जिसकी सुगंध अद्वितीय होती है.यह मृग के जननांग के समीप नाभि के पास एक गांठनुमा थैली में एकत्र एक स्त्रावित द्रव्य होता है.एक बार में करीब 30 से 45 ग्राम तक कस्तूरी प्राप्त की जाती है और इसे तीन तीन वर्ष के अंतराल में निकाला जाता है

कस्तूरी का उपयोग- दमा ,निमोनिया, हृदय रोग, टाइफाइड, मिरगी आदि रोगों में किया जाता है.इसके अलावा सौंदर्य प्रसाधनों में भी इसका उपयोग किया जाता हैकस्तूरी की मांग और मूल्य अधिक होने के कारण इसका अवैध शिकार अधिक होता है और इसी कारण इनकी संख्या में लगातार गिरावट आ रही है.

इसी कारण 1972 से इसके बचाव के प्रयास किए जा रहे हैं

* 1977 में महरूडी कस्तूरी मृग अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई है

*1986 में पिथौरागढ़ में अस्कोट अभ्यारण्य की स्थापना की गई

*1982 में कांँचुला खर्क (चमोली) में एक कस्तूरी मृग प्रजनन एवं संरक्षण केंद्र की स्थापना की गई

उत्तराखंड का राज्यकीय पक्षी

मोनाल – करीब 2500 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर रहने वाले मोनाल को उत्तराखंड का राज्य पक्षी घोषित किया गया है.इसे हिमालय का मयूर भी कहा जाता है क्योंकि इसके सिर पर भी में के समान ही कलगी होती है.मोनाल का वैज्ञानिक नाम लोफोफोरस इंपिजेनस है.उत्तराखंड के अलावा-मोनाल को हिमांचल प्रदेश के राज्य पक्षी और नेपाल के राष्ट्रीय पक्षी होने का दर्जा भी प्राप्त है.स्थानीय भाषा में इसे मन्याल या मुनाल भी कहा जाता है.नीले,काले,हरे रंगो के मिश्रण वाले इस पक्षी की पूंछ हरी होती है और सिर पर रंगीन कलगी होती है.यह अपना घोसला नहीं बनाती अपितु अपने अंडो को पेड़ों या चट्टानों के छिद्रों में रखती है.कीड़े मकोड़े और आलू मोनाल के प्रिय भोजन हैं.मांस और खाल के कारण इसका शिकार काफी अधिक होता है इसलिए यह भी अब विलुप्ति की कगार पर है

तो यह थे उत्तराखंड राज्य के प्रतीक चिन्ह और इनके बारे में जानकारी

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