उत्तराखंड की पृष्ठभूमि की एक झलक

          

उत्तराखंड की पृष्ठभूमि की एक झलक
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   उत्तराखंड की पृष्ठभूमि  में हरिद्वार ,अल्मोड़ा, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, चंपावत ,उधम सिंह नगर ,चमोली ,नैनीताल ,उत्तरकाशी और देहरादून जनपद आते हैं।  अपने गठन से पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा था।  और उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों के नाम से जाना जाता था।  इस पर्वतीय इलाके मैदानी भी है।  उत्तर प्रदेश में रहते हुए मुख्य रूप से नैनीताल ,अल्मोड़ा ,पौड़ी गढ़वाल ,टिहरी गढ़वाल के नाम से जाना जाता था।  जिसे मोटे तौर पर कुमाऊं मंडल और गढ़वाल मंडल के नाम से भी जाना जाता था।   उत्तराखंड  के गठन से पूर्व टिहरी गढ़वाल जनपद से उत्तरकाशी जनपद का , पौड़ी गढ़वाल  जनपद से चमोली और अल्मोड़ा जनपद से पिथौरागढ़ तीन नए जनपदों का गठन क्या गया था। उत्तराखंड  का गठन पर रुद्रप्रयाग ,बागेश्वर और चंपावत और देहरादून को अलग जनपदों की नई पहचान दी गई। 

Prachin Mandir Pic
Prachin Mandir

 हरिद्वार और उधम सिंह नगर जो मैदानी इलाके हैं।  नवगठित उत्तराखण्ड  के जनपद बने यदि क्षेत्रफल की दृष्टि से देखे तो रुद्रप्रयाग तथा चंपावत सबसे छोटे जनपद तथा उत्तरकाशी ,चमोली और पिथौरागढ़ सबसे बड़े जनपद है।  जनसंख्या दृष्टि से चंपावत रुद्रप्रयाग सबसे छोटे जिले हैं 

 गढ़वाल के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार है 

गढ़वाल का इतिहास रामायण और महाभारत से भी पुराना है यह प्रसिद्ध लोकप्रिय पौराणिक कथाओं जैसे भगवान शिव का किरात रूप में प्रकट होना  ,उर्वशी शकुंतला और कौरव और पांडवों के अस्तित्व की भूमि है।  इस चित्र में भगवान शिव की पूजा प्रमुख है।   रिकॉर्ड और अभिलेखों के अनुसार इस क्षेत्र का पहला नाम कारतीयेपुर था  क्योंकि यह क्षेत्र चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ था।   इसलिए बाद में इस क्षेत्र को गिरीईविल नाम से जाना जाने लगा।  जो कि समय बीतने के साथ गढ़वाल हो गया इस क्षेत्र के पहले ज्ञात राजा का नाम भानु प्रताप था जिसके बाद उसका दामाद कनकपाल राजा बना।  उनके राज्य को चांदपुर-गढ़ी  के नाम से जाना जाता था  ,यह राजा कनकपाल राजस्थान के बागेड़ क्षेत्र से गढ़वाल आया। 
 वह अपने साथ बागड़ी भाषा को लाया इसलिए गढ़वाली और बागड़ी भाषा लिखने और बोलने एक समान है। 

Kedarnath Madir
Kedarnath Temple

उत्तराखंड की सुंदरता का वर्णन

उत्तराखंड की सुंदरता का वर्णन हिमालय की भौगोलिक और गंगा यमुना की मौलिकता को समझना बहुत जरूरी है।उत्तराखंड  विभिन्न नदियों के अलावा आध्यात्मिक का उद्गम स्थल भी है।  इस राज्य में एक और आंचलिकता का अनूठा दर्शन है जो दूसरी और इसका भारतवर्ष को संस्कृति देने में अग्रिम  योगदान है। देवाधिदेव महादेव आदिशक्ति पार्वती के अलावा अनेकाएक  देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों के साथ इस परम पावन छेत्र का नाम जुड़ा हुआ है। 
आदिकाल से ही दुनिया भर के  प्रकृति प्रेमियों और खोजियो एवं पर्यटक को यहां की भूमि में अपनी और आकर्षित किया है। 
 आज भी यहां विदेशी पर्यटक और संतों का विशाल जमावड़ा देखने को मिलता है। कृषि ,पर्यटन , बिजली , परिवहन और लकड़ी उद्योग यहां के प्रमुख उद्योग है उत्तराखंड  के चारों धाम की यात्रा मई से प्रारंभ होकर नवंबर तक चलती है। 
 यमुनोत्री , गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के पथ  अप्रैल के अंतिम सप्ताह या मई के प्रथम सप्ताह में हैं  सामान्यतः यात्रा का अच्छा समय मई जून और सितंबर -अक्टूबर रहता है।  

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