गंगोलीहाट का हाट कालिका मंदिर का अनोखा इतिहास कई हजारो साल पुराना आज भी मान्यताए प्रचलित है

गंगोलीहाट स्थित हाट कालिका मंदिर कुमाऊँ कालिका मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध मंदिर है.इसे महाकाली का शक्तिपीठ भी कहा जाता है. Uttarakhand के Pithoragarh जिले के गंगोलीहाट नामक जगह पर स्थित हाट कालिका का यह मंदिर चारों तरफ से देवदार वृक्षों से घिरा हुआ एक दर्शनीय स्थल है.इस मंदिर अपने में कई रहस्य समेटे हुए है और इस तीर्थ स्थल से जुड़े हुए कई अनोखे रोचक तथ्य भी हैं तो आइए जानते हैं आज हाट कालिका मंदिर की कहानी और मान्यताए के बारे में.पूरे कुमाऊं में हाट कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर की कहानी भी उसकी ख्याति के अनुरूप है. Haat Kalika Temple of Gangolihat.कालिका देवी साक्षात् विश्राम करती है यहां, जानिये किस रेजिमेंट की हैं यह आराध्य देवी.

हाट कालिका मंदिर कहा स्थित है

हाट कालिका मंदिर पिथौरागढ़ से करीब 77 किलोमीटर की दूरी पर गंगोलीहाट नामक स्थान पर स्थित है.गंगोलीहाट बस अड्डे से इस मंदिर की दूरी करीब एक किलोमीटर है.अगर अल्मोड़ा से बात करें तो यहां जाने के दो रास्ते हैं एक शेराघाट होते हुए तथा दूसरा कांडा-पनार से.शेराघाट होते हुए अल्मोड़ा से इसकी दूरी 110 किलोमीटर है तथा कांडा-पनार होते हुए करीब 124 किलोमीटर की दूरी पर हाट कालिका मंदिर स्थित है.

 

हाट कालिका मंदिर

माँ कालिका कौन थी ?

भगवती माँ दुर्गा का स्वरुप दस महाशक्ति में एक महाकाली है और जिनके रूप काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों ,दैत्यों का नाश करने के लिए हुई थी .यह एक शक्ति का स्वरुप है जिन से काल भी भय खाता है .उनका क्रोध रोकने के लिए स्वयं भगवान शंकर उनके चरणों में आकर लेट गए थे .इस संबंध में बहुत सारी कथाये है .

मां हाट कालिका का मंदिर की कहानी

कथा1-महाकाली का महिषासुर रक्तबीज का अंत करना 

प्राचीन समय में एक सूम्या नामक दैत्य का प्रकोप था,जो कि इतना ताकतवर था कि उसने  देवताओं को भी परास्त कर दिया था. सूम्या से हारने के बाद सभी देवता शैल पर्वत पर आए और इस दैत्य के पापों से मुक्ति हेतु देवी की स्तुति करने लगे.देवताओं की भक्ति से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने महाकाली का रूप धारण किया और देवताओं को सूम्या दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाई.उसके बाद सभी देवताओं ने मां काली की इसी स्थान पर पूजा की ओर तब से यह स्थान महाकाली के शक्तिपीठ के रूप में जाना जाने लगा.यह भी कहा जाता है कि महाकाली ने महिषासुर रक्तबीज जैसे राक्षसों का अंत भी इसी स्थान पर किया था.

 

हाट कालिका मंदिर का निर्माण कैसे हुआ

कथा 2- आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी हुई कथा 

स्कन्द पुराण के मानस खंड में इस स्थान पर स्थित देवी का विस्तारपूर्वक वर्णन है. गुरु शंकराचार्य जी जब कुमाऊं क्षेत्र के भ्रमण पर आए तो लोगों ने उन्हें यहां देवी के होने वाले प्रकोप के बारे में बताया.तब यहां देवी रात को महादेव का नाम पुकारती थी और जो भी उस आवाज को सुनता उसकी मृत्यु हो जाती थी.आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपने तंत्र मंत्र और जाप से इस स्थान को  एक पत्थर कीलित किया और यहां देवी की स्थापना की और इस स्थान को उन्होंने महाकाली  का शक्तिपीठ भी कहा.

 

कथा 3 -भारत  पाकिस्तान युद्ध के बाद कुमाऊं रेजिमेंट के अफसरों ने स्थापित की मां काली की मूर्ति

हाट कालिका कुमाऊं रेजिमेंट की आराध्य देवी मानी जाती है इसी कारण कुमाऊं रेजिमेंट का जयघोष भी कालिका माता की जय और बजरंग बली की जय है.

1971 के युद्ध में जब भारत ने पाकिस्तान को हराया था.16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था .युद्ध के बाद सूबेदार शेर सिंह के नेतृत्व में एक सैन्य टुकड़ी इस मंदिर में आई और यहां मां काली की मूर्ति स्थापित की.इसके बाद 1994 में कुमाऊं रेजिमेंट के द्वारा ही इस मंदिर में एक विशाल मूर्ति स्थापित की गई.

 
माँ कालिका देवी

माँ हाट कालिका मंदिर  की मान्यताएं

मान्यता 1 रात्रि में  यहां विश्राम करती हैं मां कालिका

इस मंदिर में काफी समय से एक अनोखी प्रथा चली आ रही है.यहां के पुजारी शाम के समय मंदिर में ही एक बिस्तर लगाते हैं और कहा जाता है कि सुबह जब पुजारी उस मंदिर के कपाट खोलते हैं तो बिस्तर पर सिलवटें पड़ी रहती है जिसे देखने पर ऐसा लगता है जैसे कि कोई यहां रात को सोया हो.माना जाता है कि स्वयं महाकाली रात्रि में इस स्थान पर विश्राम करती हैं.

 

द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़ी एक मान्यता

कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब भारतीय सेना का जहाज डूब रहा था.तब सैन्य अधिकारियों ने सभी सैनिकों ने अपनी आराध्य देवी को याद करने को कहा. उसमें ज्यादातर कुमाऊं रेजीमेंट के थे इसलिए वो अपनी आराध्य देवी मां काली का जयकारा लगाने लगे.कहा जाता है कि कुछ टाइम बाद वो जहाज खुद ब खुद किनारे नग गया और सभी सैनिकों और अधिकारियों की जान बच गई.आज भी जब कुमाऊं रेजीमेंट के जवान जब भी युद्ध के लिए निकलते हैं तो इस मंदिर में माथा जरूर टेक कर जाते हैं|

 

मंदिर में चुनरी बांधने और घंटी चढ़ाने की परंपरा

कहा जाता है हाट के मंदिर में आकर जो भी सच्चे मन से मां की आराधना करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है.इसी कारण भक्त यहां आकर मंदिर प्रांगण में ही चुनरी बांधकर महाकाली से अपने मन की बात कहते हैं.मनोकामना पूरी हो जाने पर दोबारा आकर घंटी चढ़ाने की भी परंपरा इस मंदिर में है,वैसे तो पूरे वर्ष ही इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन चेत्र तथा अश्विन की नवरात्री पर मेला  लगने के कारण  उन दिनों काफी भीड़ इस मंदिर में रहती है.पहले यहां बली प्रथा दी जाती थी.लेकिन अब बली प्रथा इस मंदिर में बंद हो गई है.

 

आज हमने क्या नया जाना 

हाट कालिका मंदिर की कहानी और मान्यताएं.महाकाली से प्रार्थना है कि आपकी हर मनोकामना देवी मां जरूर पूरी करें.इसके आसपास एक और प्रसिद्ध गुफा भी है पाताल भुवनेश्वर जिसके बारे में हम आगे बताएँगे

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