स्कूल के दिन कितने अच्छे होते है वो मौज-मस्ती और पिटाई बड़े याद आते है

आज जब स्कूल से निकल गए हैं तो स्कूल कि बड़ी याद आती है.सोचते हैं कि काश हैं फिर से स्कूल हम चले जाते काश वो दिन फिर वापस आ जाते.काश वो स्कूल में दोस्तों के साथ बैठ पाते और मस्ती कर पाते.लेकिन जब हम स्कूल में थे तब स्कूल हमें एक जेल की तरह लगता था और हम उससे छूटने यानी स्कूल की छुट्टी होने का इंतजार करते.कब ये क्लास खत्म होगी कब हम यहां से छूटेंगे यही सब सोचते थे पूरी क्लास में .हर मिनट पर घड़ी देखने लग जाते अगर टीचर सही नहीं होता था तो एक एक मिनट भी  एक एक घंटे जैसा लगता था. सबसे बड़ी दिक्कत तो तब होती जब प्रियड की घंटी बजने के बाद भी टीचर पढ़ाने लगता.पीछे से आवाजें आने लग जाती फिर तो बिल्कुल भी मन नहीं लगता था कब जाता है ये टीचर क्लास से ये सोचते रहते.उस समय गुस्सा भी बड़ा आता था मगर कुछ कर नहीं सकते.स्कूल की छुट्टी होती तो ऐसे भागते जैसे जेल से छूटे हों.स्कूल मार्केट के ही किनारे था तो इंटरवल पर मार्केट जाने की अनुमति होती थी.पूरा इंटरवल हमारा मार्केट में ही गुजरता था उसके बावजूद हम क्लास के समय भी मार्केट जाते थे .स्कूल के दिन बड़े याद आते है.

लेकिन अगर क्लास से समय में किसी को बाजार में  देखते तो पूछते खत्म नहीं हुआ अभी इंटरवल कहां घूम रहे हो क्लास के टाइम पर ये भी कहते तुम लोगों की वजह से ही हमारा स्कूल बदनाम होता है स्कूल की ड्रेस में घूमते हो शर्म नहीं आती क्या कहते होंगे बाजार के लोग इस स्कूल में तो पढ़ाई की नहीं होती बच्चे दिन भर बाजार में ही दिखते हैं और भी  बहुत सुनाते थे एक टीचर ऐसे भी थे जो हमेशा अपने हाथ में एक डंडा लिए घूमते तो सूत देते थे.उनके सामने किसी के क्लास के समय  बाजार में घूमने की हिम्मत नहीं होती थी कभी अगर पकड़े भी गए तो बहाने बनाने पड़ते थे.सर प्रियड खाली था कुछ काम था बाजार में इसलिए आ गया.काम के बहाने ज्यादातर बैंक के ही बनाते थे क्योंकि बैंक स्कूल की छुट्टी होने तक बंद हो जाता था इसलिए हर रोज घर से बैंक की एक पासबुक भी लेकर आते थे.फिर भी कोई बहाना ना मिलता तो टीचर के देखने के बाद भी वहां से दुसरी ओर को  भाग निकलते.जिस तरफ भी रास्ता दिखता दौड़ पड़ते थे.रास्ता ना भी मिलता तो भी कूद देते थे जिस चक्कर में कई बार हाथ पैरों में चोट भी खानी पड़ी. छुट्टी के समय कभी टीचर भूल जाते लेकिन अगर याद रहती तो फिर छुट्टी के समय बहुत पिटाई होती थी.वो भी सभी टीचर और स्टूडेंट्स के सामने प्रिंसिपल भी कहते थे.

स्कूल के दिन
स्कूल के दिन बड़े याद आते है

कितना ही मार लो तुम लोगों को तुम लोग कुत्ते की दुम हो कभी नहीं सुधरने वाले और होता भी यही था कितना ही मार खा लें मगर क्लास के समय  बाजार जाना नहीं छोड़ते थे.जैसे ही छुट्टी होती तो ऐसे दौड़ते जैसे अभी अभी जेल से छूट कर आए हों.छुट्टी होने के बाद फिर एक चक्कर बाजार होते हुए निकलते.खेर कभी कभी बाजार का काम भी होता था.क्योंकि बाजार घर से काफी दूर ही थी इसलिए घरवाले बाजार कम  ही आते थे तब ज्यादातर सामान जैसे साग सब्जी और घर की रोज की चीजें हम ही ले जाते थे.उसके बाद हम चार पांच लोग जिनका घर हमारे ही घर के आस पास था साथ ही घर को चलते जाते समय खूब मस्ती करते और रुकते हुए जाते.कभी जाते जाते पकड़न पकड़ाई या और खेल खेलते तो कभी चुलबुली बातें होती और ऐसे ही मस्ती करते हुए हमारा स्कूल से घर तक का सफर पूरा होता.

स्कूल के दिन बड़े याद आते है.तो यही थी कुछ स्कूल की यादें इन्हें पड़कर आपको भी अपने स्कूल के दिन जरुर याद आए होंगे.जो इस समय स्कूल में हैं वो लोग अपने स्कूल के दिनों  को एंजॉय करें क्योंकि ये दिन फिर दोबारा नहीं आते

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