सास भी कभी बहू थी कुमाऊनी लोक कथा

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको एक सास और एक बहू की एक कुमाऊँनी कहानी सुनाने जा रहे हैं.यह कथा आपको एक सीख भी देगी जो आपके जीवन में हर जगह काम आएगी.सास भी कभी बहू थी कुमाऊँनी लोक कथा जब सास ने बहु से कहा कुछ ऐसा Kumauni Lok Katha सास-बहू की कहानी कुमाउनी अंदाज में Rangilo Pahad के साथ 

सास-बहू की कहानी 

एक गांव में एक मां और बेटे रहते थे.बेटा अब बढ़ा हो गया था तो मां ने उसका विवाह कर दिया और एक बहू उनके घर आ गई.बेटा बाहर शहर में काम करता था तो उसका घर आना जाना कम ही हो पाता था. इसलिए घर में दोनों सास बहू ही रहती थीं.अब सास की उम्र ज्यादा हो गई थी इसलिए वह कई काम अपने हाथ से नहीं कर पाती थीं.एक बार दोनों सास और बहू बैठे हुए थे.तो सास ने कहा

” बहू मेरी पीठ में काफी खुजली हो रही है मेरा हाथ सही से नहीं पहुंच पा रहा जरा मेरी पीठ खुजा दे”

तो बहू ने हाथ की बजाय पैर से अपनी सास की पीठ खुजला दी  सास ने कहा बहू पैर से क्यों खुजा रही है हाथ से खुजला दे. बहू ने कहा “मैं हाथ से नहीं खुजला सकती मेरा हाथ तुम्हारी पीठ तक नहीं पहुंच पाता इतना ही शौक है तो खुद ही खुजा लो”बुढ़िया बेचारी बूढ़ी थी कुछ कह नहीं सकती थीं क्या करती चुपचाप सहती गई.कुछ समय बाद बुढ़िया मर गई.अब उस बहू के बेटे की भी शादी हो गई थी और वह भी अब सास बन चुकी थीं और वह भी धीरे धीरे बुढ़ापे की तरफ बढ़ने लगी.एक बार नई बहू और वह सास दोनों बैठे थे तो सास ने कहा बहू मेरी पीठ में खुजली हो रही है जरा खुजला दे.जिस पर नई बहू भी हाथ की बजाय पैर से ही उसकी पीठ खुजलाने लगी.जब सास ने पूछा कि वह हाथ की बजाय पैर से पीठ क्यों खुजलाती है तो बहू ने भी उसे वही जवाब दिया जो उसने अपनी सास को दिया था. कि मेरा पैर तुम्हारी पीठ तक नहीं पहुंचता इसलिए खुजला रहीं हूं.अब सास को अपने दिन याद आ गए कि मैंने भी अपनी सास के साथ ऐसा ही किया था इस कारण मुझे भी आज यही सब देखना पड़ रहा है.

कहानी से सीख 

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जिंदगी में जैसा हम दूसरों के साथ करते हैं हमें भी वैसा ही मिलता है.अगर अच्छा करोगे तो अच्छा ही फल मिलेगा और अगर बुरा करोगे तो आपको भी उसका फल बुरा ही देखने को मिलेगा

इससे जुड़ा हुआ संत कबीर का एक दोहा भी है

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछताय बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय

अर्थ – इस पंक्ति में कबीर दास जी कहना चाह रहे हैं कि जो करना था वो तो कर दिया उसके बारे में पछताने अब क्या फायदा अगर पेड़ ही बबूल का बोया है तो आम कहां से खाओगे

इसी से जुड़ा हमारे पहाड़ों में एक कहावत भी है

“अघिलके जगी लाकड़ पछिलके उ”

इसका मतलब अगर लकड़ी आगे से जल रही है तो वह चलते हुए पीछे की ओर ही आएगी हम भी जैसा दूसरों के साथ करेंगे हमारे साथ भी वैसा ही होगा

इसलिए अच्छा करें और अच्छा पाएं इसी में सबकी भलाई है

उम्मीद है यह कुमाऊँनी लोक कथा आपको जरूर पसंद आई होगी.ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इसे शेयर जरुर करें.

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