पुंगेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास इस मंदिर में छुपे है कई रहस्यमयी राज

भारत के देवभूमि नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ,बेरीनाग (वेणीनाग) नागों की भूमि रूप मे प्रसिद्ध, जहां से पंचाचूली पर्वतों के समूह का मंत्रमुग्ध अनुभव होता है. पुंगेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास के बारे जानेंगे वहीं से कुछ दूरी पर बाफिला ग्राम सभा-बेरीनाग(Berinag) शहर से 8 किलोमीटर दूरी पर में नागों के प्रमुख भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है ,जिनकी पूजा यहां सुपारी(पुंगी)रूप में की जाती है यह आस्था का केंद्र एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहां भगवान शिव का शिवलिंग सुपारी के रूप में उपस्थित है ।आखिर इस मंदिर के क्या रहस्यमयी राज है और मंदिर कितने साल पुराना है मंदिर के आसपास है एक खुबसूरत झरना जिसे स्कन्द पुराण के मानसखंड में क्या कहा गया है .ब्लॉग को पूरा पड़े.

पुंगेश्वर भगवान शिव मन्दिर का इतिहास

इस शिव मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजाओं के शासन(7वीं-11वीं शताब्दी) में हुआ।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल से आयोजित की जाने वाली कैलाश -मानसरोवर यात्रा की शुरूआत यात्री इस शिव मंदिर के दर्शन पश्चात ही आगे को प्रस्थान करते थे बाद में यात्रा मार्ग परिवर्तन के चलते यह परंपरा बंद हो गयी।मान्यता है कि भगवान शिव पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती को ब्याह कर अपने मूल निवास कैलाश की ओर जब प्रस्थान कर रहे थे तब भगवान शिव और माता पार्वती इस मार्ग से होकर गुजरे और उन्होंने यहां विश्राम किया, विश्राम के दौरान, उन दोनों की कलाई में बंधे आंचल ग्रंथ (शादी की रस्म में बांधा जाता है)से पुंगी(सुपारी) का दाना भूमि में गिरा,और जिस स्थान पर यह सुपारी का दाना गिरा वहां पर भगवान शिव सुपारी के रूप में स्थापित हुऐ।पुंगी नाम से विख्यात इस स्थल का नाम “पुंगीश्वर महादेव” पड़ा जो आज “पुंगेश्वर” के रूप में जाना जाता है।


स्कंदपुराण के मानसखंड(सप्ताशोतिमोअध्याय,व्यास उवाच,87) में भी इस मंदिर का नाम “पुंगीश्वर महादेव” के रूप में उल्लेखित है इस मंदिर के उत्तर में गौरीगंगा(गोरघटी) नदी बहती है इसमें उपस्थित झरना (“छीड़ का झरना ” छीड़केस्वर महादेव l) अत्यधिक खूबसूरत और अपने पूर्ण प्राकृतिक रूप में उपस्थित , जो पर्यटन की अपार संभावनाएं समेटे हुए है यह झरना 150 मीटर से अधिक ऊंचा है।

छीड़ का झरना

स्कंद पुराण के मानस खंड अनुसार

” इस झरने के जल से भगवान शिव जलाभिषेक करते हैं और झरने के किनारे पर  रूद्र कन्याओं तथा नागकन्याओं से सेवित ‘लुंबका’ नाम की विशाल भव्य गुफा है जहां पर भगवान शिव ने कई वर्षों तक तपस्या की थी”

महादेव मंदिर वास्तुशिल्प

इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी शैली में किया गया है ,कत्यूरी राजाओं को मंदिर निर्माण के लिए जाना जाता है इनके मंदिरों की पहचान वास्तुकला में मंदिर के ऊपर लकड़ी के खूबसूरत छत्रनुमा संरचना का निर्माण , शिलालेख और ताम्रपत्रों द्वारा किया जाता है।पुंगेश्वर महादेव मंदिर, जिसके गर्भगृह में सुपारी रूप में शिवलिंग , प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं ।

 

संभावनाएं:-

  • पर्यटन क्षेत्र को क्षेत्र के प्रतिनिधियों की अनदेखी का सामना पहले से ही करना पड़ा है,पहाड़ों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रतिनिधियों के “पर्यटन” शब्द की परिभाषा में इन क्षेत्रों का होना जरूरी है।

  • इस प्राचीन मंदिर की संरचनाओं और कला को सुरक्षित रखना , मंदिर और झरने को पर्यटन के रूप में बढ़ावा देकर क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं को पैदा करना क्षेत्र के युवाओं और प्रतिनिधियों की प्राथमिकता होनी चाहिएं।

 

Pungeshwar Mahadev temple Berinag और पुंगेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास के बारे में हमें अपनी जानकारी देने का श्रेह लेखक तरुण भट्ट जी को जाता है कैसा लगा आपको शिव का यह मंदिर और आपके आस पास भी ऐसे  मंदिरों का इतिहास और कहानिया है हमें कमेंट और मेल कर सकते है धन्यवाद .जय देवभूमि उत्तराखंड.यह भी पड़े 

 

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