पहाड़ी ककड़ी चोर-उत्तराखंड की लोककथाए देवेन्द्र उपाध्याय जी द्वारा लिखी गई

पहाड़ी ककड़ी चोर

ककड़ी(खीरा) हमारे पहाड़ों में बड़े चाव से खाते हैं साथ में पिसा हुआ लहसुन या भांग का नमक हो तब तो अलग ही मजा आ जाता है.लेकिन इन सबसे ज्यादा मजा तो तब आता है जब ककड़ी चोरी की हुई हो.अपने घर की ककड़ियां खाने में को मजा नहीं को दूसरों की चोरी करके खाने में आता है.अगर पहाड़ी हो तो ये बात तुम्हें पता ही होगी. मैंने भी अपने दोस्तों के साथ मिलकर काफी ककड़ियां चुराई हैं.कभी स्कूल जाते समय तो कभी गाय बच्छियों का ग्वाला जाते समय जब भी ककड़ी चुरानी होती पहले दिन ही प्लेन बन जाता.पहाड़ी ककड़ी चोर उसी दिन सबको अलग अलग जिम्मेदारी दी जाती एक को नमक पीसकर लाने की तो एक को घर से चाकू लाने की और दो ककड़ी चोरी करने जाते.ककड़ी की बेल ज्यादातर पेड़ पर ही लिपटी होती.हम चुराते भी उन्हीं ककड़ियों को थे जो घर से थोड़ी दूरी पर हो क्योंकि घर के पास होने पर पकड़े जाने का डर ज्यादा रहता था.

ककड़ी चोरते समय एक ककड़ी(Kakadi) की बेल जिस पेड़ पर लिपट होती उस पेड़ पर चड़ता.और दूसरा किसी झाड़ी के किनारे छुपकर कोई आ तो नहीं रहा ये देखता अगर कोई आ रहा होता तो वह इशारा कर देता और पेड़ वाला पेड़ में ही छुप जाता ताकि कोई पेड़ कि तरफ ना देखे.जब वो चला जाता तो ही ककड़ी चोरी का प्रोग्राम आगे बड़ता.ककड़ी चोरने के बाद हैं स्कूल को जाते.ककड़ी खाने के लिए इंटरवल तक का इंतजार भी नहीं हो पाता था.जब टीचर आगे से पड़ा रहे होते तो हम पीछे बैठकर चाव से  ककड़ी खा रहे होते.आगे क्या पढ़ाया जा रहा है इससे हमें कोई मतलब नहीं होता.

एक बार गुरुजी पीछे आ गए और हम चारों को ककड़ी खाते हुए देख लिया उस दिन हमारी ककड़ी तो ली ही,हम चारों को भी क्लास के आगे खड़ा कर दिया.हमारी शिकायत स्कूल के प्रिंसिपल साहब से भी कर दी गई और फिर प्रिंसिपल रूम में भी हमारी खूब कुटाई हुई और यह बात हमारे घर तक भी पहुंच गई और पहुंचाई भी हमारे ही गांव के दोस्तों ने जो हमसे काफी चिड़ते थे.और हमारे ही स्कूल में पढ़ते थे.

घर आने के बाद काफी डांठ पड़ी और मार भी पड़ी.इस वजह से नहीं कि हम लोग क्लास में ककड़ी खा रहे थे बल्कि  इस वजह से खाई कि वह ककड़ी आयी कहा से क्योंकि घर से तो चारों में से कोई के नहीं गया था.तब से घरवालों को हम पर शक होने लगा कि यही औरों की ककड़ियां चुराते हैं.क्योंकि आस पड़ोस वाले कहते रहते कि आज हमारी ककड़ियां चोरी हो गई.इसके बाद जब भी आस पड़ोस वाले कहते कि मेरी घर से ककड़ी चोरी हुई है तो सबसे पहले हमसे ही पूछा जाता कि तुमने तो नहीं चुराई है और यह बात सच भी थी हम ही ज्यादातर उन ककड़ियों को चुराते थे.

 

दोस्तों कैसी लगी आपको उत्तराखंड की लोककथाए ‘पहाड़ी ककड़ी चोर’ जिसे लिखा गया देवेद्र उपाध्याय जी द्वारा .उत्तराखंड सबंधित जानकारी पड़ने के लिए हमारे साथ जुड़े रहे और हमें फॉलो करे धन्यवाद -RangiloPahad 

 

यह भी पड़े 

 

रंगीलो पहाड़ व्हाट्सप्प ग्रुप जुड़ने के लिए क्लिक करे – rangilopahad

 

Leave a Reply

%d bloggers like this: