धौलीनाग नाग देवता मंदिर बागेश्वर

DholiNag Devta Mandir
धौलीनाग नाग देवता मंदिर बागेश्वर

ऐसा कहा जाता है कि एक समय बागेश्वर के क्षेत्र में नागों का राज़ था। जिस कारण यहां काफ़ी नाग मंदिर स्थित हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है धौलीनाग देवता का मंदिर। यह मंदिर बागेश्वर से करीब 30KM की दूरी पर विजयपुर के पास पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। धौलीनाग देवता का यह मंदिर काफ़ी पुराना है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने कालिय नाग को यमुना छोड़कर जाने को कहा तो कुछ समय पश्चात यह कुमाऊँ के क्षेत्र में आया और भगवान शिव की तपस्या करने लगा। स्थानीय लोगों की प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा करने के कारण इसे भगवान के रूप में पूजा जाने लगा। धौलीनाग को कालिय नाग का ज्येष्ठ पुत्र माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि प्रारंभ में धौलीनाग ने स्थानीय लोगों को काफ़ी सताया। जिसके बाद लोगों ने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी,ताकि वह उन्हें हानि ना पहुँचाए इससे धौलीनाग देवता के स्वभाव पर काफ़ी असर पड़ा और  वह स्थानीय लोगों को सताने की बजाए उनकी रक्षा करने लगे महर्षि वेद व्यास जी ने स्कंद पुराण के मानस खंड में धौलीनाग देवता के बारे में लिखा है कि

धवल नाग नागेश नागकन्या नीसेवतम।

प्रसादा तस्य सम्पूज्य विभवं प्राप्नुयातर:।।

यहां हर वर्ष नाग पंचमी को मेला लगता है। जिसमें काफ़ी दूर दूर से लोग आते हैं। इस दिन यहां बनी हुई खीर काफ़ी प्रसिद्ध है।जिसके लिए कमस्यार घाटी के सभी 22 गाँवों के लोग अपने अपने घरों से दूध लेकर आते हैं। जिससे इस खीर को बनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस खीर को खाने से आत्मिक शांति मिलती है।

एक लोकमान्यता के अनुसार धौलीनाग देवता पर कुछ संकट आ गया था और धौलीनाग देवता ने ग्रामीणों को आवाज़ दी। जिस पर धपोलासेरा के भूल जाति के लोग रात को ही 22 हाथ लम्बी चीड़ के छिलके के बनी हुई मसाल लेकर आए और धौलीनाग देवता को संकट से निकाला। इसी कारण भूल जाति के लोग आज भी पंचमी के दिन 22 हाथ लंबी चीड़ के छिलके से बनी हुई मसाल लेकर धौलीनाग देवता की जय जयकार करते हुए आते हैं। मंदिर से कुछ दूरी पर इन्हें पोखरी के चन्दोला लोग मिलते हैं। जिनके साथ देव डांगर भी अवतरित होकर गाजे बाजे के साथ आते हैं। इसके बाद ये मंदिर में प्रवेश करते हैं और मंदिर की परिक्रमा करने के बाद इस मसाल को मंदिर के सामने रखा जाता है और इस दिन यहां रात्रि का मेला भी लगता है।

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