लेखक कमल पन्त जी द्वारा कहानी -मेरे बचपन की यादें कुछ खट्टी मीठी

नमस्कार दोस्तों आज में आपके लिए बचपन की यादें लेकर आया हूं जो कि गाय बच्छियों को जंगल में चराने के लिए ले जाने यानी ग्वाला जाने की है.आज लोग काफी कम पशुओं को पाला करते हैं. यहां तक कि गांवों में भी काफी कम गाय बच्छियां बंधी हुई दिखती हैं.लेकिन पहले घर में गाय बाच्छियां और बकरियां पाली जाती थी.तो संख्या ज्यादा होने के कारण सब के लिए घास पूरी नहीं हो पाती थीं और इसलिए गाय बच्चियों को चराने के लिए जंगल ले जाया जाता था.जिसे हमारे पहाड़ों में ग्वाला जाना कहते हैं.

मेरे बचपन की यादें 

रविवार के दिन या जिस दिन भी स्कूल की छुट्टी होती .हम भी ग्वाला जाते थे गाय बच्छियों को चराने.असल में चराना तो सिर्फ एक बहाना होता था.असल में उस दिन आस पास के सभी दोस्त भी हमारे साथ चराने के लिए जंगल आते थे.तो हमारा साथ हो जाता था और दोस्तों के साथ खूब मस्ती कर सकें क्रिकेट खेल सकें.इसलिए हम भी खुशी खुशी ग्वाला जाने को तैयार हो जाते.
सुबह करीब आठ या नौ बजे घर से नाश्ता पानी करके हम ग्वाला जाने को निकल पड़ते.सभी गाय बच्छियों बकरियों को लेकर निकलते.साथ ही हाथ में एक बल्ला और एक बॉल भी लेकर चलते.ताकि वहां क्रिकेट खेल सकें.जाते समय गाय बच्छियां बैल ये सभी तो आसानी से सीधे सीधे रास्ते पर चलते.मगर बकरियों को ले जाने में आफत आ जाती थीं.वो कभी नीचे को जाने लगती तो कभी ऊपर को.सीधे रास्ते पर चलती ही नहीं थीं.खदेड़ते खदेड़ते थक जाते.उस समय बकरी कहने लगते अगर हाथ पड़ गई तो आज तो मार ही देंगे करके.लेकिन बकरी कहां समझती.लेकिन जब पकड़ में आ जाती तो सूत देते थे.लकड़ी से इतना सूत देते कि चलते समय उसके पैर लड़खड़ाने लगते.जब घर में इजा देखती तो कहती किलै रे आज कि भौ तक दुनी दुनी करण त तो (क्यों क्या हुआ आज इसे सही से चल क्यों नहीं पा रहा ये.)
हम भी बड़े शान से जवाब देते ” हाड़ लानल कत्ति बै यथकै उथकै जानचि मील जै कि हान राखी “( मार लाया होगा कहीं से इधर उधर का रहा था मैने थोड़ी मारी इसे)

इसी प्रकार बड़ी मुश्किल से जंगल पहुंचाते. वहां सभी की गाय बच्छियां आई होती थी और हम भी अपने गाय बच्छियों को उन्हीं के साथ चराने लगा देते और हम अपना घूमने या फिर क्रिकेट या अकुच और खेलने में लग जाते और खेलने में इतना मग्न हो जाते कि उनका ध्यान ही नहीं रहता था.ध्यान तब आता जब गालियां पड़ने लगती थीं.क्योंकि गाय बच्छियां उज्याड़ चले जाती और जिसके खेत में जाती वो गालियां देने लगता था.फिर उनको हकाकर लेकर आते लेकिन फिर से खेत में ही चले जाती थीं.एक दिन तो खतरनाक ही कारनामा हो गया.रोज की तरह गए थे गाय बच्छियां चराने और हम लग गए थे खेलने खेलते खेलते ध्यान ही नहीं रहा.जब घर जाने का समय आया तो तो गाय और बैल तो वहीं थे मगर बकरियां दिख ही नहीं रहीं थीं.कितना ढूंढ़ा मिली ही नहीं काफी देर हो गई फिर वैसे ही घर जाने लगे.उस दिन बहुत डर लग रहा था .

क्योंकि बिना बकरियों के जा रहे थे.घर पहुंचे तो देखा कि बकरियां अपनी जगह पर बंधी हुई थीं.थोड़ा तो मन को शांति मिली लेकिन फिर भी डर लग रहा था. कि ये आई कब.अंदर गए तो मम्मी डंडा लेके खड़ी थी.पहले तो बहुत पिटाई हुई.कहने लगी कि बकरियां चराने जाते हो या कहां जाते हो बकरियां दस बजे घर आ गई तो तुम तीन बजे आ रहे हो.पूरा खेत चर दिया गेंहू सुखाने डाले थे सब खा गए.किसलिए भेजते हैं तुम्हें ग्वाला देख नहीं सकते हो कि कहां जा रही हैं बकरियां.
तो यहीं यादें थी बचपने की यादें हमारे ग्वाला जाने की शायद कुछ ऐसा ही आपके साथ भी होता होगा ग्वाला जाने में.

कुमाऊँनी कहावते 

 

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