पहाड़ों में लकड़ी और पत्थरो से बने घर की बनावट

पहाड़ों में बने लकड़ी पत्थरों से बने निर्मित घर

 पत्थरो से बने निर्मित  घर
लकड़ी और पत्थरो से बने घर

आज के समय में घर बनाने के लिए ईट,सीमेंट,लोहा,रेता आदि चीज़ों की आवश्यकता होती है. लेकिन पहले पुराने समय में जब घर बनाए जाते थे वो सीमेंट और ईट से नहीं बल्कि लकड़ी और पत्थरो से बने घर से बनाए जाते थे. आज भी ऐसे घर हमारे पहाड़ों में देखने को मिल जाते हैं. जैसे-अल्मोड़ा बागेश्वर,पिथौरागढ़ आदि जगहों में देखने को मिलते हैं.जिनमें से से आज के समय में कुछ ही सही सलामत हैं ज़्यादातर खंडहरों में तबदील हो चुके हैं.

उत्तराखंड का यह जिला पत्थरो (पटालो)और बाल मिठाई के लिए भी प्रशिद्ध है

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कैसे बनते है पहले पहाड़ों में घर 

इन घरों में पत्थरों की दीवार बनायी जाती थी. इसके और छत बनाने के लिए पहले बल्लियाँ और लकड़ी की फंटियाँ लगायी जाती थी और बीच में एक गोल और काफ़ी मोटी लकड़ी लगायी जाती थी जिसे पहाड़ी भाषा में बाँष कहा जाता है.उसके बाद उसके ऊपर लकड़ी के पटाल बिछाए जाते थे. ये पटाल (पाथर) कुछ मकानों में इतने बड़े होते हैं कि आज के समय में इनको उठाने के लिये तीन या चार लोगों की ज़रूरत पड़ती है इससे यह भी पता चलता है कि पुराने ज़माने में लोग कितने ताकतवर थे और हो भी क्यों ना वो आजकल की तरह मिलावटी खाना थोड़ी ना खाते थे. अपने घरों में ही उगाया हुआ शुद्ध खाना खाते थे.

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देहली और दरवाज़ों पर बनायी गई कलाकृतियाँ

इन घरों के देहली छज्जे ( खिड़की ) की लकड़ियों पर –देवीदेवता,राजाओं,नाग,सूर्य,चन्द्रमा आदि के चित्र बनाए गये हैं जो कि एक सानदार काष्ठकला और लोककला के उदाहरण हैं. घर के ऊपरी हिस्से में भी नाना प्रकार की कलाकृतियाँ इन घरों में बनायी गयी हैं.

पक्षियों के घोसले के लिए जगह

इसके अलावा इन घरों में पक्षियों के रहने के लिए अलग से छेद छोड़े जाते थे ताकि चिड़ियाएँ उनमें अपना घोसला बना सकें. तब चिड़ियों का घर में घोसला बनाना काफ़ी शुभ माना जाता था.

बाखली के रूप में बनते थे घर

यह घर केवल एक परिवार के लिए नहीं बल्कि बाखली के रूप में बनाए जाते थे ये बाखली इतनी बड़ी होती थी कि इनमें 8 या 10 परिवार रहते थे और सब एक साथ मिलकर रहते थे यह उस समय की एकजुटता का भी प्रतीक है

पैंट करने का तरीका

इन घरों में पैंट करने के लिए कमेट( एक प्रकार का सफ़ेद पदार्थ ) का उपयोग किया जाता था. जो कि जंगल से लाया जाता था. मुझे आज भी याद है जब कमेट लाना होता था तो सारे गाँव के लोग एक साथ जंगल जाते थे.ऐसा लगता था मानो जैसे वहाँ मेला लगा हो.
इसके अलावा यह घर मौसम रोधी भी होते हैं. ठंड के दिनों में इनमें उतना ठंडा नहीं लगता और ना ही गर्मी के दिनों में ये गर्म होते हैं

आज हमने जाना किस तरह से गॉव या पहाड़ो में कसी तरह से पहले या आज भी लकड़ी और पत्थरो से बने  घर  हम प्रयाश कर रहे है पहाड़ो के सोंदर्य को आगे बढाने और पहाड़ो से जुडी रोचक कहानियो के बारे में जानकारी अगर आपके पास भी कुछ जानकारी हो हमारी मदत कर सकते है  हमें कमेंट करे

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