कुमाऊँ भाषा : कुमाऊँनी भाषा में एक अलग ही मिठास छुपी है

कुमाऊँनी भाषा में एक अलग ही मिठास छुपी है

उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र की मुख्य भाषा कुमाऊँनी है और इस भाषा में एक अलग ही मिठास छुपी होती है. जैसे-अगर कोई कहीं जा रहा है तो उससे ये कहना कि “काहूँ हरै रे त्यार दौड़”या किसी से रास्ता पूछना है तो “अरे दाज्यु पा वां जाण बाट बता दियो किसी को नमस्कार कहने की बजाए “पैलाग” या “जैद्यो” कहना और आशीर्वाद में “ज्यूजाग” कहना सामने वाले को एक अपनापन सा अहसास दिलाता है. पूरे कुमाऊँ क्षेत्र में अलग अलग रीति रिवाजों के लोग रहते हैं इसलिए इनकी बोली भी अलग अलग है. जो कि अलग अलग क्षेत्रों में बोली जाती है. जिनमें से कुछ प्रमुख बोलियाँ इस प्रकार हैं

कुमाँऊनी कहावते पड़े -जैली था ,विली पै 

कुमाऊँनी भाषा की कुछ प्रमुख बोलिया

अस्कोटी:- यह पिथौरागढ़ के सीरा क्षेत्र के उत्तर पूर्व में अस्कोट के अंतर्गत बोली जाती है. यह एक मिश्रित बोली है. जिसमें सीराली,नेपाली और जोहारी अत्यधिक है.
सीरा:-अस्कोट के पश्चिम और गंगोली के पूर्व के क्षेत्र में यह बोली बोली जाती है.
सीराली:- सीराली के क्षेत्र में बोली जाने वाली सीरा बोली को ही सीराली कहते हैं.
सौर्याली:-पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में सौर्याली बोली जाती है.
कुमैयाँ:-काली कुमाऊँ के अंतर्गत बोली जाने वाली इस बोली के क्षेत्र उत्तर में पनार और सरयू,पूर्व में काली,पश्चिम में देवीधुरा तथा दक्षिण में टनकपुर तक हैं.
गंगोली:-गंगोलीहाट के अंतर्गत बोली जाने वाली इस बोली का प्रभाव पश्चिम में दानपुर,दक्षिण में सरयू,उत्तर में रामगंगा व पूर्व में सोर तक है.
दनपुरिया:-दानपुर परगने में यह बोली जाती है.
चौगर्खिया:-काली कुमाऊँ के पश्चिम के उत्तर पश्चिम से लेकर पश्चिम के बारामडंल तक इसको बोला जाता है
खास्पाजिन्या:-इसको बारामडंल के क्षेत्र में बोला जाता है.
पछाई:-अल्मोड़ा के पालि क्षेत्र के अंतर्गत रानीखेत,द्वाराहाट,मासी को चौखुटिया तक इसे बोला जाता है.
रौ-चौभेंसी:-उत्तर पूर्वी नैनीताल जनपद के रौ और चौभेंसी क्षेत्र में इसे बोला जाता है.

कुमाऊँनी भाषा उत्तराखंड में बोले जाने वाली भाषा
कुमाऊँनी भाषा के शब्द

विलुप्ति की ओर

लेकिन धीरे धीरे हम अपनी कुमाऊँनी भाषा को पीछे छोड़ते जा रहे हैं. किसी जगह की पहचान के लिये वहाँ की भाषा एक मुख्य भूमिका निभाती है. अगर हमारी भाषा ही हमें पता नहीं होगी तो हमारी क्या पहचान रहेगी. हमें अपनी मात्रभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि इसी से हमारी पहचान है. क्यों हम किसी में कुमाऊँनी में बात करने से शर्माते हैं. हमारी संस्कृति को इस प्रकार धूमिल ना होने दें. अगर किसी से मिले जो कि कुमाऊँ से हो और कुमाऊँनी भाषा जानता हो जो उसे पहाड़ी में ही बात करें अपनी मात्रभाषा बोलने में कैसी शर्म. अगर उसे पहाड़ी नहीं आती तो उसे सिखाएँ या सीखने को कहें. अन्यथा हम अपनी भाषा,अपनी संस्कृति और अपनी पहचान को हमेशा के लिये खो देंगे
हमारा उद्देश्य है आपको सटीक जानकारी देना कोन कोन साथी अपनी भाषा के ज्यादा प्रयोग करता है हमें कमेंट करना न भूले

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