हर्ष देवी ओली की जीवनी – काली कुमाऊँ का शेर नाम से विख्यात महान स्वंत्रता सेनानी

काली कुमाऊँ का शेर कहे जाने वाले हर्ष देव ओली जी की जयंती उत्तराखंड में अनेक वीरों ने जन्म लिया है जिन्होंने हमारे देश को स्वतंत्रता दिलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है.आज भी हमारे उत्तराखंड से कई युवा सेना में जाकर देश की रक्षा करते हैं.हमारे उत्तराखंड की ही जमीं पर एक ऐसे वीर भी पैदा हुए हर्ष देव ओली जिन्हें काली कुमाऊँ का शेर  – Harsh dev Oli Tiger of Kali Kumaon कहा जाता है लेकिन यह नाम इन्हें अपने पराक्रम के बल पर नहीं बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता अपने जोश पूर्ण स्वरूप के बल पर मिला है.तो आइए जानते हैं आज इनके जीवन और इनके द्वारा किए गए कार्यों के बारे में

हर्ष देव ओली की जीवनी 

काली कुमाऊँ का शेर  का जन्म 4 मार्च 1890 को चम्पावत जिले के खेतीखान के एक गांव गोसानी में हुआ था.हर्ष देव जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गांव से ही हुई.लेकिन 11 वर्ष की उम्र में इनके पिता का साया इनके ऊपर से उठ गया.इसके बाद ये मायावती आश्रम में रहने लगे.कुछ समय बाद आगे की पढ़ाई के लिए इन्होंने रैमजे इंटर कॉलेज अल्मोड़ा में प्रवेश ले लिया.अल्मोड़ा में उस समय लोग राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति काफी जागरूक थे इसका प्रभाव हर्ष देव ओली जी पर भी पड़ा और वह भी आंदोलन में कूद गए.

इन्होंने शुरुआत प्रत्रकारिता के कार्य से की और अखबारों में कार्य करना शुरू किया.इसी क्रम में जब 1946 में कांग्रेस का लखनऊ में अधिवेशन हुआ तब उस अधिवेशन में हर्ष देव ओली जी भी गए और यहीं उनकी मुलाकात मोती लाल नेहरू जी से हुई.1919 में मोती लाल जी ने इन्हें अपने द्वारा शुरू किए गए इंडिपेंडेंट अखबार का उप संपादक नियुक्त किया.इसके संपादक सी. एस. रंगायर थे 1920 में रंगायर जी के गिरफ्तार होने के कारण इन्हें संपादक का कार्यभार सौंपा गया.

1923 में ओली जी नाभा एस्टेट गए .जहां के राजा रिपु दमन ने इनकी बुद्धिमत्ता और सूझ बूझ से प्रभावित होकर इन्हें अपना सलाहकार नियुक्त किया.लेकिन इसके कुछ समय बाद ये मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू जी के साथ गिरफ्तार हो गए.जेल से छूटने के बाद ये कुमाऊं क्षेत्र में आए और इसके बाद से लगातार कुमाऊं में हुए सभी आंदोलनों में सक्रिय रूप से कार्य करने लगे.इन्होंने कुली बेगार ,कुली उतार ,कुली बरदायश,जैसी प्रथाओं के उन्मूलन में अग्रिम भूमिका निभाई .1929 में इन्होंने लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व किया.1930 में इन्होंने जंगलात के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया. अंततः 5 जून 1940 को इनका देहांत हो गया.
कुमाऊं की जनता ने इन्हें काली कुमाऊं का शेर के नाम से पुकारा.तथा अंग्रेजों ने इन्हें मुसोलिनी नाम दिया.मुसोलिनी एक इटली का नेता हुआ करता था जिसके कार्य करने का तरीका हर्ष देव जी से मिलता था .इसलिए अंग्रेजों ने इन्हें मुसोलिनी नाम दिया

तो यह दी हर्ष देव ओली जी की जीवनी और उनके द्वारा किए गए कार्य –लेख पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

उत्तराखंड करेंट अफेयर्स 2021

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