Haridwar Kumbh mela 2021- आखिर कुम्भ मेला क्यों लगता है जानिए इतिहास

haridwar Kumbh mela 2021 कुंभ मेला हरिद्वार 2021 haridwar उत्तराखण्ड जैसा कि आप सभी को पता ही होगा कुंभ मेला हर बारह वर्ष बाद लगता हैऔर अर्ध कुंभ मेला हा छः साल बाद लगता है. समूचे भारवर्ष में कुल चार जगहों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है और हरिद्वार भी उनमें से एक जगह है जो कि गंगा नदी के तट पर स्थित है.हरिद्वार में कुंभ मेला 12 वर्ष बाद 2021 में लगने जा रहा है.हरिद्वार जो कि गंगा स्नान और अपनी खूबसूरती के लिए काफी प्रसिद्ध है साथ ही यह उत्तराखंड का एक मुख्य पर्यटक स्थल भी है. आज हम आपको इस आर्टिकल में बताएंगे कि कुंभ का मेला कहाँ लगता है (kumbh mela kaha lagta hai) और कुम्भ मेला कितने साल बाद लगता है , कुंभ मेला कब है 2021 और कुंभ मेला क्यों लगता है? 

कुंभ मेला क्यों लगता है ?

कुंभ का अर्थ होता है कलश.कुंभ बारह राशियों में स एक राशि भी है जिसका प्रतीक भी कलश ही है.कुंभ मेले का इतिहास समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है.एक बार महर्षि दुर्वासा स्वर्ग लोक आए ओर इन्द्र देव से मिले.उन्होंने इन्द्र देव को एक दिव्य माला उपहार स्वरूप दी.लेकिन इन्द्र उस समय नशे में चूर थे महर्षि दुर्वासा की दी हुई माला उन्होंने अपने एरावत हाथी को पहना दी और हसने लगे.इन्द्र के इस व्यवहार से दुर्वासा ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने देवताओं को श्राप से दिया इस श्राप से देवता कमजोर पड़ने लग गए और शत्रुओं की शक्ति बढ़ने लगी और असुरों ने देवताओं को हरा दिया.देवता बहगवान विष्णु से जाकर मिले.भगवान विष्णु ने देवताओं को देत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर में समुद्र मंथन करने की सलाह दी.इसके बाद से देवता और देत्य मिलकर समुद्र मंथन करने लगे.समुद्र मंथन में मंदरांचल पर्वत मथनी बनाया गया और बासुकिनाग को नेती. कच्छप अवतार लेकर भगवान विष्णु स्वयं मंदरांचल पर्वत का आधार बन गए.समुद्र मंथन का कार्य प्रारंभ हुआ.

समुद्र मंथन में देवताओं ने वासुकिनाग की पूंछ पकड़ी थी और दैत्यों मुंह इससे देवताओं में शक्ति का संचार हो रहा था और दैत्यों की शक्ति धीरे धीरे क्षीर्ण हो रही थी.समुद्र मंथन में कुल 14 रत्न निकले सबसे पहले विष निकला जिसे भगवान शंकर ने पिया उसके बाद अन्य चीजें निकली उसके बाद अंत में धनवंतरी अमृत का कलश लेकर आए धन्वंतरि के हाथ में अमृत देख देत्य उसे लेने के लिए दौड़े धन्वंतरि वहां से भागे देवताओं और असुरों के बीच अमृत को लेकर युद्ध शुरू हो गया.कहा जाता है कि इस युद्ध में अमृत की बूंदें चार जगहों प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा ,यमुना,सरस्वती के संगम पर,नासिक में गोदावरी नदी ,उज्जैन में शिप्रा नदी और हरिद्वार में गंगा नदी में गिरी.इसी कारण इन्हीं चार जगहों पर कुंभ मेला लगता है.

कहा जाता है कि देवताओं ओर असुरों के बीच यह युद्ध 12 दिनों तक चला देवताओं के 12 दिन धरती के 12 वर्षों के बराबर माने जाते हैं इसी कारण हर 12 वर्ष बाद कुंभ का मेला लगता है कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जिस प्रकार घड़ी में हर 12 घंटे बाद पुराना समय आता है उसी तरह हर 12 वर्ष बाद भी नदियों का जल अमृत लेकर आता है

कुंभ के आयोजन पर बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं ओर सूर्य मेष राशि में

हरिद्वार कुंभ मेला 2021 (Haridwar kumbh mela 2021)

उत्तराखंड की मायानगरी कहे जाने वाले हरिद्वार नगर में इस वर्ष यानी 2021 में कुंभ मेला लगने जा रहा है.जैसा कि कोरोना महामारी के कारण इस बार हरिद्वार कुंभ मेले पर काफी असर पड़ेगा लेकिन फिर भी कुंभ की तैयारियां जोरों पर हैं.लेकिन इस बार कुंभ मेला 12 वर्षों बाद नहीं 11 वर्षों बाद लग रहा है इसका कारण यह है क्योंकि ग्रह गोचर के अनुसार बृहस्पति अगले साल कुंभ राशि में प्रवेश नहीं करेंगे इस कारण इस वर्ष ही कुंभ का आयोजन हो रहा है.

हरिद्वार कुंभ मेले में दिखे लोक संस्कृति के रंग

कुंभ के अवसर पर मायानगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया है.दीवारों पर इस वर्ष उत्तराखंड की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी.जिसमें कुमाऊं के रीति रिवाज और सांस्कृतिक नृत्य छोलिया नृत्य के भी चित्र उकेरे गए हैं इससे उत्तराखंड की लोक संस्कृति को भी एक अलग पहचान मिलेगी

कुंभ मेला हरिद्वार 2021 के मुख्य स्नान

कुंभ मेले में 6 दिन मुख्य स्नान का खासा महत्व है
पहला स्नान तो 14 जनवरी 2021 को हो गया है –
अन्य मुख्य स्नान निम्न हैं
11 फरवरी 2021 मौनी अमावस्या के दिन
16 फरवरी 2021 बसंत पंचमी के दिन
27 फरवरी 2021 माघ पूर्णिमा के दिन
13 अप्रैल 2021 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को
24 अप्रैल 2021 रामनवमी को

हरिद्वार में कुंभ का मेला कब लगेगा

दोस्तों उम्मीद करता हु आपको सभी जानकारी अच्छे से समझ में आई होगी आज हमने जाना haridwar Kumbh mela के बारे में और कुम्भ मेले का इतिहास .

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