हरिद्वार जिले के 8 दर्शनीय स्थल जहा हर कोई जाना पसंद करता है

हरिद्वार पर्यटन स्थल – haridwar paryatan sthal -हरिद्वार जिसे माया क्षेत्र या मायापुरी भी कहा जाता है.उत्तराखंड का मात्र एक जिला नहीं है बल्कि यह पूरा जिला पर्यटन स्थलों से घिरा हुआ है.हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है. खूबसूरती से भरा हुआ होने के साथ ही हरिद्वार पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है.इतिहास के कई बड़े बड़े शासकों ने इस नगर का भ्रमण किया है और यहां की खूबसूरती का आनंद लिया जिनका विवरण हमें इतिहास में देखने को मिलता है तो आइए जानते हैं आज हरिद्वार जिले का इतिहास और हरिद्वार जिले के दर्शनीय स्थल 

हरिद्वार जिले का इतिहास

हरिद्वार से जुड़ी पौराणिक कथाओं और हरिद्वार के पर्यटन स्थलों के बारे मेंहरिद्वार 28 दिसंबर 1988 को जिले के रूप में अस्तित्व में आया .पहले यह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मंडल का हिस्सा था.उत्तराखंड राज्य गठन के बाद इसे गढ़वाल मंडल का हिस्सा बनाया गया.हरिद्वार जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है हरी का द्वार यानी भगवान का प्रवेश द्वार.पुराणों और संस्कृत साहित्य से जुड़े ग्रंथों में इसे मायापुरी,माया क्षेत्र, गंगाद्वार,तीर्थस्थलों का प्रवेश द्वार,चार धामों का द्वार,स्वर्गद्वार आदि कई नामों से इसका वर्णन किया गया है.कहा जाता है कि महाभारत काल में इसका नाम खांडव वन था और यहां पांडवों ने अपना अज्ञातवास बिताया था.विदुर ने मेत्रेय ऋषि को महाभारत कथा यहीं सुनाई थी और साथ ही धृतराष्ट्र ,गांधारी और विदुर ने अपने प्राण यहीं त्यागे थे.चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां का भ्रमण 634 ई. में किया था और उसने हरिद्वार को “मो – यू- लो” कहा जिसका अर्थ होता है मयूर्पुर
अकबर भी आया था हरिद्वार
मुगल वंश के शासक अकबर के भी इस स्थान पर आने का विवरण मिलता है.जो कि अबुलफजल द्वारा लिखित “आईने अकबरी” में मिलता है.इसमें यह भी कहा गया है कि अकबर का भोजन गंगा नदी में पानी से ही बनता था.यह जल अकबर हरिद्वार से ही मंगाया करता था.जहांगीर के समय 1608 में टांम कारयट हरिद्वार आया था और इसने हरिद्वार को भगवान शिव की राजधानी कहा.

हरिद्वार की पौराणिक कथाएं

कपिल मुनि का आश्रम
कहा जाता है कि रामायण काल से पूर्व हरिद्वार में कपिल मुनि का आश्रम हुआ करता था.इसी कारण इसे कपिला भी कहा गया है. राजा सगर के अश्वमेघ यज्ञ घोड़े को इन्द्र ने छुपा दिया था.तब सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को ढूंढते हुए कपिल मुनि के आश्रम में आए .उन्होंने कपिल मुनि का अपमान किया जिनके श्राप के कारण राजा सागर के सभी पुत्र भस्म हो गए.आगे चलकर राजा भगीरथ ने गंगा को धरती पर बुलाकर अपने पूर्वजों का उद्धार किया.

समुद्र मंथन की कथा
कहा जाता है समुद्र मंथन के बाद जब धनवंतरी अमृत के कलश को इस स्थान से के जा रहे थे तब अमृत की कुछ बूंदे यहां गिरी.इसी कारण यहां हर 12 वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.जो कि इस वर्ष 2021 में मनाया जा रहा है.

देवी सती के देहत्याग की कथा
हरिद्वार के दक्षिण में स्थित कनखल शहर शिव कि पत्नी देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति की राजधानी थी.दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसका न्योता उन्होंने भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को नहीं दिया.सती को जब यह पता चला तो वह यज्ञ में जाने की जिस करने लगी .भगवान शंकर ने जाने से मना किया तो सती अकेले ही यज्ञ में चली गई.देवी सती जब यज्ञ में पहुंची तो उन्होंने न्योता ना देने का कारण पूछा.जिस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव का आपमान किया जिस कारण सती काफी दुखित हो गई और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने शरीर का त्याग कर दिया.

हरिद्वार के पर्यटन स्थल

हर की पैड़ी हरिद्वार

उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के भाई भतृहरि ने यहां के शिवालिक श्रेणी की तपस्या की थी.अपने भाई की मृत्यु के बाद उसकी याद में विक्रमादित्य ने गंगा पर भतृहरि घाट का निर्माण किया.इसे ही बाद में हर की पैड़ी के नाम से जाना गया.आगे चलकर अकबर के सेनापति मान सिंह ने इसका पुनर्निर्माण कराया.यहां ब्रह्मकुंड नामक एक पवित्र कुंड है.कहा जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

माया देवी मंदिर हरिद्वार

माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है .यह देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है और हरिद्वार से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.यहां पर देवी सती के हृदय और नाभि के भागा गिरे थे.माया देवी मंदिर में स्थित मूर्ति में देवी के तीन सिर और चार हाथ दिखाए गए हैं .कहा जाता है कि इसी मंदिर के कारण ही हरिद्वार को मायापुरी भी कहा जाता है.

मंसा देवी मंदिर हरिद्वार

हरिद्वार नगर के पश्चिम में शिवालिक पर्वत श्रेणी के शिखर पर मां मंसा देवी का मंदिर है.ब्रह्म देव के मन से उत्पन्न होने के कारण इसे मंसा देवी कहा जाता है.हरिद्वार में इनकी तीन मुख और पांच भुजाओं वाली अष्टनाग वाहिनी मूर्ति स्थापित है.हरिद्वार के दर्शन हेतु आने वाले भक्त मनसा देवी मंदिर का दर्शन जरूर करते हैं.बिल्व शिखर की चोटी पर स्थित होने के कारण मंसा देवी मंदिर में जाने के लिए रोपवे मार्ग का प्रबंध भी किया गया है

चंडी देवी मंदिर हरिद्वार

हरिद्वार स्थित चंडी देवी का मंदिर पूर्व की तरफ नील शिखर पर स्थित है.पौराणिक कथा के अनुसार शुंभ निशुंभ नामक दो दैत्यों ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य कर लिया था.तब देवी ने चंडी का रूप लिया और शुंभ निशुंभ का वध कर देवताओं को खोया हुआ राज्य वापस दिलाया.कहा जाता है कि शुंभ निशुंभ के वध के बाद मां चंडी देवी ने कुछ समय तक यहां विश्राम किया था.इस मंदिर में जाने के लिए भी पैदल और रोपवे दोनों मार्गों का प्रबंध है

सप्तऋषि आश्रम हरिद्वार

इस आश्रम से गंगा नदी सात धाराओं में विभक्त हो जाती है.पौराणिक कथा के अनुसार जब गंगा धरा पर उतरी और इस स्थान पर पहुंची तो उसने देखा कि यहां सप्तऋषियों का आश्रम था.गंगा इस असमंजस में पड़ गई कि किस ऋषि के आश्रम के सामने से निकले.क्योंकि किसी एक ऋषि के सामने से निकलने पर ओरों का अपमान होता साथ ही ऋषियों के क्रोध का परिणाम भी भोगना पड़ता.तब देवताओं की सलाह के अनुसार गंगा नदी सात धाराओं में विभक्त हो गई और यहीं पर आज सप्तऋषि आश्रम हरिद्वार स्थित है.ध्यान करने और आत्म शांति के लिए यह हरिद्वार की सबसे उपयुक्त जगह है.

भारत माता मंदिर हरिद्वार

यह मंदिर हमारे देश के शूरवीरों स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित है.देशभक्ति और देशप्रेम से सुसोजित भारत माता मंदिर हरिद्वार में ही गंगा नदी के पास सत सरोवर पर स्थित है.

कनखल

यह एक उपनगर है जो हरिद्वार के ही दक्षिण में स्थित है.प्राचीन काल में यह सती के पिता दक्ष प्रजापति की राजधानी थी.देवी सती ने यहीं अपना देह त्याग किया था.यहां दक्षेश्वर महादेव,तिलाभडेश्चर महादेव,महिषासुर मर्दिनी,महाविद्या मंदिर आदि स्थित हैं.

पतंजलि योगपीठ हरिद्वार

योग सीखने और आसान सिखाने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा योगपीठ है.पतंजलि आयुर्वेद से निर्मित उत्पाद बनाता है.जिसके प्रोडक्ट आज भारत ही नहीं पूरे विश्व के कोने कोने तक फैले हुए हैं.

तो यह था उत्तराखंड का एक पर्यटन और आध्यात्म से भरपूर हरिद्वार शहर ,हरिद्वार का इतिहास और हरिद्वार जिले के दर्शनीय स्थल

बागेश्वर बागनाथ मंदिर का इतिहास कई हजारो साल पुराना यहाँ भगवान शिव एक बाघ के रूप में अवतरित हुए थे

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