न्याय के देवता गोलू देवता की रहस्यमय कहानी -Story Of Golu Devta In Hindi

देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड में देवी -देवताओं(भगवान का स्वरूप ) का पूजन और उनकी मान्यता काफी प्राचीन है.इस भूमि को स्वर्ग भी कहा गया है.ऐसा माना जाता है पहले से ही यह बहुत सारे देवी देवताओ की निवास भूमि रही है उनमे से एक प्रसिद्ध देवता उन्हें न्याय के देवता और मनोकामना पूर्ण करने वाले देवता के नाम से पुकारा जाता है वह देवता है गोलू देवता(Golu Devta).आखिर गोलू देवता कौन है? गोलू देवता मंदिर कहा है? गोलू देवता का जन्म कैसे हुआ और उन्हें देवता क्यों कहा जाता है ?गोलू देवता की कहानी(Story of Golu Devta) आपको बताते है .ऐसा कहा जाता है जो भी भक्त गोलू देवता के शरण में आता है  गोलू देवता उसके सभी दुःख दूर कर देते है और जो भी मनोकामना मांगते है पूरी हो जाती है. जी हा दोस्तों में आगे आपको पुरे विस्तार से बताने वाला हु गोलू देवता की चमत्कारी शक्तियों और गोलू देवता का सबसे प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा चितई मंदिर यही वो मंदिर है जहा भक्तो की मनोकामना भगवान गोलू पूरी करते है.पहले आपको कहानी बताते है.

न्याय के देवता गोलू देवता की कहानी

गोलू देवता की कहानी

उत्तराखंड के कुमाऊनी गोलू देवता की कहानी रहस्य से भरी हुई है बात तक की जब कुमाऊं के चंपावत के कत्यूरी राजा झलराई की सात रानियां थी पर किसी भी रानी से कोई संतान नहीं थी तब राजा ने संतान पाने के लिए अनेक देवताओं की पूजा दान किये और कई सारे उपाय किये कोई फल न मिलने के बाद वे पंडित और ज्योतिषियों के शरण में गए .उन्होंने राजा की जन्म कुंडली देखकर बताया की वे आठवा विग्रह करे तो उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी .

आगे अब राजा झलराई ने आधी रात को सपना देखा जिसमे नीलकंठ पर्वत पर बैठे कलिंका नामक सुन्दर कन्या को देखते है और दूसरे दिन यह बात सभी दरबारियों को बताते और स्वय ही अपनी सेना के साथ नीलकंठ पर्वत की ओर चल दिए और काफी वर्षो बाद आखिर उन्हें तपस्या में लीन कलिंका मिली.राजा झलराई ने अपना परिचय कलिंका को बताया में धौली धुमाकोट का राजा हू मेरी 7 रानियां है लेकिन कोई संतान नहीं है और कलिंका से अपनी आठवी रानी बनने का निवेदन किया|ध्यान में रखते हुए कलिंका ने राजा को सलाह दी की वे साधु के पास जाकर विग्रह(शादी) की अनुमति मांगे.राजा साधु के पास जाकर पीड़ा सुनाते है और साधु ने राजा की पीड़ा सुनकर विग्रह की अनुमति दे दी. 

पंचनाम देवताओं की बहन कलिंका से राजा का विग्रह हो गया आगे राजा अपनी आठवी रानी कलिंका को लेकर अपने राज्य धौली धुमाकोट वापस आ गए .कलिंका अपनी सौतो से मिलने गयी तो रानियों ने उसका स्वागत नहीं किया |कुछ सालो में रानी कलिंका गर्भवती हुई यह सुनकर राजा प्रसन्न हो गया और सातों रानिया  ईर्ष्या की आग में जलने लगी .राजा को अपने राज्य से बाहर जाना पड़ा जाते समय उसने रानी के  कमरे में एक घंटी बाधी और कहा की पुत्र जन्म होने पर वह घंटी बजाये और उसकी आवाज सुनकर वह तुरंत चला आएगा .इर्ष्या से सातों रानियों ने राजा के जाने के बाद झूठ में ही घंटी बजा दी जिससे राजा आया पर गुस्से से वापस चला गया.सातों रानिया कलिंका के गर्भ से संतान को मिटाने के उपाय में आपस में एक हो गई |

आखिर रानी कलिंका से संतान उत्पन्न हुई तो अन्य रानियों ने उसके बच्चे की जगह पर खून से सना सिल बट्टा(एक प्रकार का बड़ा पत्थर) रख दिया और बच्चे को खतरनाक गायो के गोशाला(गोठ) में फेंक दिया जिससे गाय उसे कुचल दे .और हुआ उल्टा बालक गोलू गायो का दूध पीकर बड़ने लगा और रानी से कहा की तेरे गर्भ से यह सिल बट्टे पैदा हुए है जिस कारण रानी काफ़ी दुखी हुई .

अब आगे रानियों ने गोशाला जाकर देखा की नवजात बालक सुरक्षित है और उन्होंने उसे सिसून(बिच्छु घास ) की झाड़ियो में फैक दिया .सात दिन बाद भी बच्चा जीवित था सातों रानियों ने बच्चे को नमक के ढेर भी डाल .वह भी बच्चे का बल भी बांका नहीं हुआ.जब भी कोई भी चाल कामयाब नहीं हुई अंत में उन्होंने बच्चे को एक टोकरी में रखा और दूर जंगल में छोड़ दिया गोलू देवता का फिर भी कुछ नहीं कर पाया आख़िरकार रानियों ने एक और नै चाल में एक काठ के सिंदूर में बच्चे को रखा उसमे नमक की तह बिछाकर संदूक को काली नदी में फैक दिया पर वह डूबा नहीं.संदूक सात दिन तक बहते -बहते आठवे दिन गोरीघाट में भाना मछुवारे के जाल में फस गया|

मछुआरे ने संदूक खोलकर देखा उसमे हंसता खेलता बच्चा निकला .भाना की कोई संतान नहीं थी जिससे वह प्रसन्न होकर उसे घर ले गया उसका पालन करने लगा .उसी बच्चे का नाम गोलू रखा गया.गोलू ने सपने में एक बार अपनी माँ कलिंका और पिता झलराई को देखा और भाना को सारी बात बता दी यह भी कहा की वे ही उसके असली माँ -बाप है. उसने अपने माँ-बाप से घोडा माँगा भाना ने एक लकड़ी(काठ) का घोडा बनाकर दे दिया.वह काठ के घोड़े पर घुमने लगा .एक बार वह अपने घोड़े को पानी पिलाने उस जगह ले गया जहा वे सातों रानिया नहाने के लिए आती थी .रानियों में उसके घोड़े को पानी न पिने दिया बालक गोलू ने रानियों के घड़े फोड़ दिए  रानियों ने कहा…

       “काठ का घोड़ा पानी कैसे पी सकता है “ बालक गोलू ने उत्तर दिया -”जब एक औरत सिलबट्टे को जन्म दे सकती है तो काठ का घोडा कैसे पानी नहीं पी सकता है “

रानियों ने यह बात सुनकर भयभीत हो गयी बात राजा के कानों तक पहुंची उसने गोलू को बुलाया और अपनी बात सिद्ध करने को कहा.गोलू ने अपनी माता कलिंका के साथ हुए अत्याचारों की साडी गाथा सुना दी .राजा ने उसी समय गोलू को अपना पुत्र स्वीकार किया और सातों विमाताओ को प्राण दंड दे दिया गया.लेकिन न्याय के देवता गोलू ने उन्हें क्षमादान देनी की अपील की.

न्याय देवता के रूप में गोलू आज भी पुरे कुमाऊँ के बहुत प्रसिद्ध है यही बालक ग्वल देवता थे और इसी कारण इन्हें न्याय के देवता भी कहा जाता है और इनका वाहन घोड़ा है.गोलू देवता का प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा चितई मंदिर है .जहा भक्तो को हर रोज जमावड़ा लगता है जो भी भक्त को कोई भी मनोकामना मांगनी है वह एक पत्र में लिखकर मंदिर के आस पास लगा देता है और उसकी वह मनोकामना पूर्ण हो जाती है .इसका प्रमाण चितई गोलू देवता के मंदिर दर्शन से आपको पता चलेगा गोलू देवता की कृपा आप सभी भक्तो पर बनी रही और आप जरुर आये .गोलू देवता की कहानी और उनकी चमत्कारी शक्तियों के बारे में हमने जाना कैसे लगा आपको जरुर बताए.


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