उत्तराखंड लोककथा-श्राद्ध की बिल्ली की कहानी

एक गांव में एक बुढ़िया रहती थीं.जिसका एक बेटा था और एक बहू थीं.बेटा गांव से बाहर शहर में नौकरी करता था और उसकी बहू भी ज्यादातर अपने पति के साथ ही रहती थीं.उस बुढ़िया ने एक बिल्ली पाल रखी थी.बुढ़िया को उस बिल्ली से काफी ज्यादा लगाव था.घर में अकेले होने पर बिल्ली को ही वह अपना एकमात्र सहारा समझती थीं.उसकी बहू भी जब घर आती तो अपनी सास को बिल्ली के साथ ही देखती थी.श्राद्ध पक्ष का समय था तो बुढ़िया के पति की काफी समय पहले मृत्यु हो चुकी थी.इसलिए उसका श्राद्ध था.घर में तरह तरह के पकवान बने हुए थे.लेकिन बिल्ली जहां तहां मुंह मार दे रही थी.खाने में मुंह ना मार दे इस कारण उसने बिल्ली को एक टोकरी में थोड़ी देर के लिए बंद कर दिया.अब हर वर्ष जब भी श्राद्ध का वक्त आता तो वह सास बिल्ली को कुछ समय के लिए टोकरी में बन्द कर देती थीं.आगे पड़े बिल्ली की कहानी क्या है 

एक बार बुढ़िया बीमार पड़ गई बहू ने उसकी खूब सेवा की उसका काफी ध्यान रखा.मगर उम्र हो गई थीं और वह चल बसी.अब हर वर्ष की तरह का वर्ष भी श्राद्ध पक्ष का समय आया.बहू ने अपनी सास को हर बार श्राद्ध के समय टोकरी में बंद करते हुए देखा था और उसकी बहू इसे एक परंपरा की तरह समझती थीं.उस बिल्ली को वह भी श्राद्ध के समय टोकरी में बन्द कर देती.अब एक दिन वह बिल्ली भी मर गई.अब श्राद्ध का समय था बिल्ली तो मर गई थी.लेकिन बहू को श्राद्ध के समय टोकरी में बंद करने के लिए बिल्ली चाहिए थीं.क्योंकि इसे वह एक रीति रिवाज मानती थीं.अब वह हर वर्ष श्राद्ध के समय कहीं ना कहीं से बिल्ली लेकर आती कर और उसे कुछ समय के लिए बंद कर देती कर यही बार बार चलते रहा.उस बहू को क्या पता कि उसकी सास खाने को बचाने के लिए उस बिल्ली को टोकरी में बंद रखा करती है

बिल्ली की कहानी से सीख हमारे धर्म में कई ऐसी चीजें और रीति रिवाज हैं जिन्हें लोग आज अंधविश्वास मानते हैं.लेकिन हर किसी के पीछे कुछ ना कुछ कारण अवश्य है.यह कहानी भले ही एक ऐसा रिवाज बता रही हो जिसे करने का कोई मतलब नहीं लेकिन हमारे समाज में कई ऐसे रिवाज हैं जिन्हें मानने का आज भी महत्व है.हमारा उद्देश्य लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है.बल्कि जो लोग इसे अंधविश्वास समझते हैं उन लोगों को इनसे अवगत कराना है कि कई कार्य ऐसे हैं जिन्हें करने के पीछे कारण भी है उन्हें बेकार ही अंधविश्वास का नाम ना दें.सभी रिवाजों के पीछे ऐसे ही कारण नहीं होते कईयों के पीछे वैज्ञानिक कारण भी होते हैं.

सास भी कभी बहू थी कुमाऊनी लोक कथा

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