बचपन की यादें ज़िंदगी का सबसे सुहाना पल सुकून से भरा

बचपन

बचपन की यादे और सुहाना पल सुकुन भरा

बचपन ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत लम्हा होता है.बचपन हाय वो समय है जब हम अपनी ज़िंदगी को बिना किसी फिक्र बिना किसी लालच के जीते हैं. बचपन में ही हम सबसे ज्यादा शरारत भी करते हैं. जो भी मन में आया सीधा बोल देते हैं. फ़िर चाहे उससे कुछ भी हो जाए उसकी परवाह तब नहीं होती.आज इस आर्टिकल में हम आपको अपने ही जीवन के कुछ खास पलों के बारे में बताने जा रहे हैं.जो शायद आपने अपने बचपन में भी बिताए होंगे तो आईये शुरू करते हैं….

बचपन की यादें,bachpan ki wo yaadein

माँ सुबह सुबह भोर होने से पहले ही उठ के घर के काम करने लग जाती. जब भोर होती और चिड़ियाओं का चहचहाना सुनती तो हमें जगाती और कहती

 “उठ आब कब तक पड़िए रुंछे द्यख भैर के आब तो चवाड़ प्वाथ ले उठ बेर चिचांड़ भग्यान उठ जल्दी उठ

यानी (हिंदी में ) उठ जा अब कब तक सोए रहता है. जरा उठ कर देख अब तो चिड़ियाँऐं भी उठ के चहचहाने लगी हैं. उठ जा जल्दी

और हम उठ गई (उठ गया हूँ ) कह कर फ़िर से सो जाते. उसके कुछ देर बाद माँ फ़िर कहती “आब तो दोफरि हगे आब तो उठ जा”(अब तो दोपहर हो गयी है अब तो उठ जा )

 

माँ का डाटना

फिर हज़ारों नख़रे दिखाने के बाद हम उठते फ़िर माँ हमें नहलाती धुलाती,हमारे लिए नाश्ता बनाती और हमें स्कूल के लिए तैयार करती.लेकिन कभी -कभी जब हम स्कूल जाने का मन नहीं होता तो हम ना जाने के लिए बहाने बनाते. जिस पर माँ काफ़ी गुस्सा होती और डाँठने लगती और कहती “न जाने तू स्कूल आज है घर पने कि करले दिन भर याँ म्यक तौयाले जा जल्दी स्कूल ” (नहीं जाना है आज तू स्कूल को जा जल्दी खाली यहां रह के मुझे परेशान करेगा ).उसके बाद काफ़ी नख़रे दिखाने के बाद और उदास मैन से रोता हुआ मुँह बनाकर हम स्कूल को जाने लगते रास्ते में कुछ दोस्त भी रुके रहते थे उनसे मिलने के बाद हम सब कुछ भूल सा जाते और तरह तरह की बातें करते हुए स्कूल को निकल पड़ते और ये बातें स्कूल से घर आने तक खत्म नहीं होती थी क्लास से लेकर घर आने तक चलती रहती क्लास में टीचर जब बात करता हुआ देखते तो कान पकड़कर कहते क्या करते हो इतनी बातें तुम्हारी बातें को कभी खत्म ही नहीं होती इसके बाद आगे कान पकड़कर खड़ा रहने को कहते लेकिन तब भी बातें करना नहीं छोड़ते थे हम.इसके बाद इंटरवल होता तो साथ मिलबाँट कर खाना खाते और फ़िर खेलने लगते कभी क्रिकेट कभी गिल्ली डंडा पकड़नपकड़ाई और भी कई सारे खेल कभी खेलते खेलते चोट भी लग जाती,कभी कभी तो खून भी आने लगता लेकिन फ़िर भी दर्द महसूस नहीं होता था और खेलना नहीं छोड़ते थे. उसके बाद फ़िर क्लास में बैठ जाते लेकिन फ़िर मन नहीं लगता था और सोचते थे कि कब छुट्टी हो जाए.छुट्टी होने के बाद तो एसे हल्ला गुल्ला करते हुए भागते जैसे जैल से छूट कर आए हों. घर पहुँचने के बाद बैग को एक कोने में फैंकते और खेलने के लिए निकल पड़ते खेलते खेलते कब शाम हो जाती पता ही नहीं चलता था. जब अंधेरा होता तो माँ आवाज़ लगाने लगती”काँ ग्योछे रे ने उने आज घर अन्यार ह्यगो आब तो जल्दी आ बाग ले आल फ़ी”( कहा गया जल्दी आ अब तो अंधेरा हो गया है बाग आ सकता है )
इन बातों में माँ की चिन्ता और ममता दोनों ही छुपी होती थी और
फ़िर हम घर आ जाते. घर आने के बाद माँ पढ़ाती हमें खाना भी खिलाती सच में कितना काम करती थी माँ.

तो यही कुछ यादें हैं जो बचपन में बिताई.आप की भी दिनचर्या इससे कुछ मिलती जुलती ही रही होगी. आज भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो वही सब याद आता है. कभी कभी हँसी भी आती है तो कभी दुख भी होता है कि अब हमने वो बचपन वो शरारतें खो दी
उम्मीद है आपको यह आर्टिकल ज़रूर पसंद आया होगा

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