मेरे बचपन के दिन और ग्वाला जाने की यादे लेखक कमल पन्त जी के शब्द

मेरे बचपन के दिन और बचपन की यादे

मेरे बचपन के दिन और यादे शेयर करने शेयर कर रहा हु दोस्तों ,आपका बचपन भी कुछ एसा ही रहा होगा चलिए शुरू करते है . आज के बदलते समय में गाँवों में भी गाय बच्छियों का पालन काफ़ी कम हो गया है. लेकिन पहले ऐसा नहीं था. तब गाँव में गाय बच्छियाँ बकरियाँ पाली जाती थीं. ज़्यादा गाय बच्छियाँ होने के कारण उनके लिए घर में घास और चारा पर्याप्त नहीं हो पाता था. तो उन्हें चराने के लिए जंगल ले जाना पड़ता था. जिसे ग्वाला जाना भी कहते थे.जब नास्ता करके गाय बच्छियों की रस्सियाँ निकालकर हाथ में एक लट्ठी लिए हम उन्हें जंगल को ले जाने लगते.कभी कभी साथ बल्ला और एक गेंद भी लेते हुए निकलते ताकि वहाँ क्रिकेट खेल सकें. गाय बच्छियाँ तो सीधे सीधे जंगल को जाने लगती पर बकरियों को जंगल पहुँचाना काफ़ी मुश्किल हो जाता था.क्योंकि बकरियाँ कभी इधर चले जाती तो कभी उधर खासकर बकरियों के छोटे छोटे बच्चे वो तो कभी हाथ ही नहीं आते थे.

बडी मुश्किल खदेड़कर हम उन्हें जंगल पहुँचा पाते थे.तब जाकर सुकून मिलता. फ़िर सभी बकरियों और गाय बच्छियों को एक साथ चरने के लिए लगा देते और हम तरह तरह के खेल खेलने लगते. कभी क्रिकेट कभी पकड़न-पकड़ाई कभी गिल्ली-डंडा तो कभी कुछ और खेलते खेलते कब समय बीत जाता पता ही नहीं चल पाता. कभी कभी गाय बच्छियाँ उज्याड़ ( किसी के खेत में चरने लग जाती ) चले जाती तब जिसके खेत में जाती वो गाली देने लगते और गाली भी ऐसी देते कि पूछो ही मत.

कुमाऊँनी भाषा का प्रयोग 
“ने चरूना रे भैलिके त गोर बाछन्क है सब उज्याड़ खे है म्यार के सन्दरे ग्यूँ हराछि झने खे पांड़ पया त गोर बाछन्क दूध.ग्वाव ऊँछा चरे ने द्यख ने सगना का जाड़ान कबेर

हिंदी में विस्तार से अर्थ 
(अच्छे से नहीं चरा सकते गाय बच्छियों को कितने सुंदर गेहूँ के पेड़ हुए थे सब खा दिया.इन गाय बच्छियों का दूध ना ही खा पाना. ग्वाला आए हो कहाँ जा रहीं हैं गाय बच्छियाँ देख नहीं सकते.

कभी कभी ऐसी गालियाँ भी पड़ती थी

कुमाऊँनी भाषा का प्रयोग हुआ है .
त्यर लाख जे उमर धैयि जो. झनै पास हये तू य साल

हिंदी में विस्तार से अर्थ 

( तेरी उमर आगे ना बड़े और इस साल पास ही मत होना )

इस गाली सुनने पे सबसे ज्यादा डर तब लगता था जब रिजल्ट आने वाला होता था.
एक दिन तो हद ही हो गयी. रोज़ की तरह गाय बकरियों को एक जगह पर चराने लगाकर हम खेलने चले गये. खेलते खेलते पता ही नहीं चला कि कब समय निकल गया. घर जाते समय देखा तो गाय तो थी मगर बकरियाँ थी ही नहीं. कितना ढूँढा मिली ही नहीं .फ़िर डरे डरे हुए घर को गये देखा तो बकरियाँ वहीं बँधी हुई थी. लेकिन उस दिन जो पिटाई हुई तब से गाय बकरियों को अकेले छोड़ना भूल गये. क्योंकि उस दिन बकरियाँ पहले ही घर पहुँच चुकी थी और माँ ने जो अनाज बाहर सुखाने डाला था उसे भी बकरियों ने आधा खा दिया था तो कुछ गिरा दिया था.तब उस दिन काफ़ी ज़्यादा पिटाई हुई.

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तो यही थी मेरे बचपन के दिन  कुछ यादें बचपन के ग्वाला जाने की उम्मीद है आपको यह ज़रूर पसंद आयी होगी

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